History & Background

राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनेकों कोशिशों के फलस्वरूप एनआईडी की स्थापना हुई। 1950 के दशक में दोनों ताकतों के मिलने से भारतीय संस्कृति और शिक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ। स्वतंत्र भारत के लिए यह एक पुनर्मूल्यांकन और पुनर्निर्माण का समय था। एक युवा राष्ट्र के लिए आधुनिक प्रौधोगिकी और विचारों के साथ हमारी पुरानी परंपराओं के बीच संतुलन बनाने के साथ-साथ राष्ट्र निर्माण जैसे विशाल कार्य का दायित्व सामने था। आधुनिक आंदोलन, कला, वास्तुकला और ड़िजाइन में मशिनों के प्रयोग का खूबसूरती के लिए दर्शनशात्र और क्रांतिकारी प्रयोग एक ही समय में सब घटित हो रहे थे। जिंदगी के हर पहलू के लिए एक भारतीय पहचान की खोज शुरू हुई।

भारतीय शिला परंपरा के लेखक और भारतीय हथकरघा और हस्तशिल्प निर्माण परिषद के संस्थापक पुपुल जयकर ने 1955 में प्रसिद्ध अमेरिकी ड़िजाइनर चार्ल्स ईम्स से मुलाकात को “दी टेक्सटाइल एण्ड ओरनामेंटल आर्टस ऑफ इंडिया” नाम से इस संग्रहालय में एक अनोखी प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। और इस तरीके से दो मशहूर व्यक्तियों के बीच वार्तालाप जीवनभर के लिए शुरू हुई।

उसी समय भारत सरकार पुपुल जयकर और अन्य समान विचारधारा वाले लोगों की सलाह के तहत ड़िजाइन के एक संस्थान की स्थापना पर विचार किया । 1950 के दशक में भारत में तेजी से औद्योगिकीकरण का विकास हुआ जिसके फलस्वरूप इस तरह के संस्थान की माँग और मजबूत हुई। 1957 में भारत सरकार ने चार्ल्स और रे ईम्स को भारत यात्रा पर बुलाने के फोर्ड फाउंडेशन से अनुरोध किया। चार्ल्स और रे ईम्स पूरे भारत में घूमकर लेखकों, कारिगरों, वास्तुकारों, वैज्ञानिकों, उद्योगपतियों, शिक्षाविदों और दार्शनिकों से मिलकर उनके साथ बैठक किया। और पूरे भारत की सैकडों तस्वीरें इस दौरान लिया।

7 अप्रैल 1958 को चार्ल्स और रे ईम्स ने भारत सरकार को इंडिया रिपोर्ट प्रस्तुत किया। ईम्स रिपोर्ट के तहत उन्होंने अंतर्निहित भारत को परिभाषित किया जिससे कि एनआईडी की स्थापना और भारत में ड़िजाइन शिक्षा की शुरूआत की जा सकती थी। रिपोर्ट के अनुसार वास्तविक अनुभव के साथ सीखने और साथ-साथ ड़िजाइन द्वारा समस्याओं को सुलझाने का सुझाव दिया साथ ही एक सुझाव दिया की ड़िजाइनर परंपरा और आधुनिकता के बीच पुल साबित हो सकते हैं। रिपोर्ट के जरिए भविष्य के ड़िजाइनरों से आग्रह किया कि समकालीन देश के लिए उपलब्ध विकास के अन्य विकल्पों की फिर से जाँच की जाए।

इंडिया रिपोर्ट में की गई सिफारिशों के आधार पर फोर्ड फाउंडेशन और साराभाई परिवार की सहायता से भारत सरकार ने राष्ट्रीय औद्योगिक ड़िजाइन संस्थान की स्थापना की, मूलरूप सितम्बर 1961 में अहमदाबाद में एक स्वायत्त अखिल भारतीय बॉडी के रूप में जाना जाता था। गौतम साराभाई और उनकी बहन गिरा ने एनआईडी की स्थापना की और प्रारंभिक वर्षों में एक प्रमुख भूमिका निभाई थी। उन्होंने बाँहॉस ड़िजाइन आंदोलन के दर्शन जो कि करके सीखने की पद्धती को पुनर्जिवित किया। यह अनुठा पाठ्यक्रम और क्रांतिकारी शैक्षिक दर्शन वर्तमान तक एनआईडी का हिस्सा है। आज एनआईडी अंतराष्ट्रीय स्तर पर औधोगिक, संचार, टेक्सटाईल और आईटी इंटीग्रेटेड (अनुभवात्मक) ड़िजाइन के लिए बेहतरीन शिक्षा और अनुसंधान संस्थानों में से एक के रूप में विख्यात है। यह वाणिज्य और उद्योग भारत सरकार के मंत्रालय के तत्वाधान में एक स्वायत्त संस्था है। एनआईडी ड़िजाइन अधिनियम 2014 के राष्ट्रीय संस्थान के आधार पर संसद के अधिनियम द्वारा राष्ट्रीय महत्व की संस्था घोषित किया गया है। यह संस्थान भी एक वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान संगठन के रूप में भारत के वैज्ञानिक विभाग और औद्योगिक अनुसंधान सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त है।

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