नीलीमा हसीजा

नीलीमा हसीजा, एनआईडी में डिज़ाइन के मूल सिद्धांतों के विभिन्न पाठ्यक्रमों जो विशेष संदर्भ के साथ सिरामिक और ग्लास डिज़ाइन से संबंधित हैं, का अध्यापन करती हैं। 1995 में एम. एस. विश्वविद्यालय, वडोदरा से ललित कला में स्नातक की उपाधि प्राप्त करने के बाद नीलीमा एनआईडी के एडवांस प्रवेश कार्यक्रम में दाखिला लिया और सिरामिक डिज़ाइन में विशेषज्ञ हैं। इन्हें 13 साल का कार्य अनुभव है और संस्थान में एक शिक्षक के रूप में 2002 में शामिल हुई हैं। इन्होंने विभाग में आदानों को आकार देने और कांच से संबंधित विषयों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके रूचियों में विभिन्न पारंपरिक शिल्प और संस्कृति, शिल्प अनुसंधान और डिज़ाइन, विकास, माल और संस्कृति के लिए डिज़ाइन शामिल हैं। वे शिक्षा पैनल, सह-अध्यक्ष, सलाहकार समिति, नाइडस के (एनआईडी कर्मचारी समिति द्वारा चलाया जाने वाला एनआईडी परिसर की दुकान), प्रवेश पैनल के सदस्य, और पाठ्यक्रम की समीक्षा समिति सदस्यों 2003 के  एक सदस्य किया गया है। 2005 में सह-संकाय शिल्पा दास, के साथ इन्होने एक राष्ट्रीय संगोष्ठी, "भारतीय शिल्प : दा फ्यूचर इन ए ग्लोबलिज़िंग वर्ल्ड" का एनआईडी मे आयोजन किया। नीलीमा ने पूरे भारत में कारीगरों के लिए कई परियोजनाओं और कार्यशालाओं आयोजित किया है। ये कई स्तरों पर इनकी समझ को और गहरा और इन्हे मेटीरियल और फार्म को अवगत करने मे नीतिनिर्धारक और शिल्प के सामाजिक,आर्थिक और स्थिरता-उन्मुख मुद्दों को व्यापक बनाते है। 2010 में, इन्होने पिछड़े वर्ग के क्रॅफ्ट्स-पर्सन के मिट्टी के बर्तनों और टेराकोटा शिल्प के लिए एकीकृत डिज़ाइन विकास प्रशिक्षण/कार्यशाला आयोजित की। 2009 में, इन्होने राजस्थान में "मोलेला मन्नत टेराकोटा" को अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के रूप में यूनेस्को  पेश करने के लिए के लिए इसकी रिसर्च टीम के लिए नेतृत्व किया। इससे पहले, इन्होने बांकुड़ा, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश में टेराकोटा कारीगरों के साथ परियोजनाओं कोआयोजित किया था। पिछले दो वर्षों से, नीलीमा भारत सरकार के विभाग के "विज्ञान और प्रौद्योगिकी" की परियोजनाओं एक प्रधान अन्वेषक हैं।

hneelima[at]nid [dot]edu

उत्तरदायित्व

  • गतिविधि उपाध्यक्ष, आउटरीच प्रोग्राम एवं आईसीआईसी
  • संयोजक, सिरामिक एवं ग्लास डिज़ाइन
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